India News (इंडिया न्यूज़),Chandramani Shukla, Lucknow News: घोसी विधानसभा उपचुनाव के परिणाम आने के बाद से उत्तर प्रदेश की सियासत में लोकसभा चुनाव को लेकर चल रही गतिविधियों में औऱ तेजी देखी जा सकती है। सत्ताधरी दल भाजपा उपचुनाव में हार के कारण पर मंथन कर रही है। वहीं समाजवादी पार्टी इस जीत के बाद I.N.D.I.A. गठबंधन के सहारे नए समीकरण तैयार कर रही है। इन सबके बीच घोसी विधानसभा उपचुनाव के परिणामों को देखते हुए बसपा ने भी अपनी रणनीति में कुछ बदलाव किया है।
बसपा के संगठन में तेजी लाने के लिए अब कॉडर बैठकों में सर्व समाज के लोगों को बुलाया जा रहा है। इन बैठकों को लेकर ऐसा बताया जा रहा है, बसपा सुप्रीमो मायावती ने आदेश दिया है कि एक दिन में कम से कम दो बैठकें होनी चाहिए जो करीब 40 दिनों तक चलेंगी।
बसपा की तरफ से बैठकों को लेकर जो तेजी देखी जा रही है उसके पीछे का सबसे बड़ा कारण समाजवादी पार्टी को ही माना जा सकता है क्योंकि उपचुनाव में सपा की जीत के बाद उसे उम्मीद जगी है कि बसपा के वोट बैंक को अपनी तरफ लाने पर वह लोकसभा चुनाव में बेहतर कर सकती है। इसी को देखते हुए समाजवादी पार्टी की ओर से बसपा से पार्टी में आए नेताओं को एक विशेष जिम्मेदारी दी गई है। जिसके तहत वह गांव-गांव जाकर सामाजिक न्याय के मुद्दे पर सपा के पक्ष में जनता को लाने का प्रयास करेंगे। इसके पहले ऐसा देखा गया है कि अखिलेश यादव लगातार जिलेवार समीक्षा बैठक कर रहे हैं।
इसमें सभी सेक्टर प्रभारियों के नेतृत्व में दलित नेताओं को आगे करने का समाजवादी पार्टी की ओर से फैसला किया गया है। अगर लोकसभा चुनाव की तैयारीयों को देखें तो समाजवादी पार्टी की तरफ से जहां अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय को साथ लेते हुए ओबीसी वर्ग को अपनी तरफ रखने का प्रयास है साथ ही दलित वर्ग को लेकर भी खास फोकस है।
इसी के चलते अखिलेश यादव ने PDA का फॉर्मूला दिया था। अब जब घोसी विधानसभा उपचुनाव के परिणाम उनके पक्ष में आए हैं तो अखिलेश यादव की तरफ से ऐसी कोशिश की जा रही है कि दलित वर्ग का वोट हासिल करने के लिए कोई कसर न छोड़ी जाए। उत्तर प्रदेश के 2022 के विधानसभा चुनाव में भी ऐसा देखा गया था की दलित वोट बैंक का झुकाव भाजपा की ओर अधिक था। जिसका सबसे बड़ा कारण फ्री राशन और किसानों को मिलने वाली सम्मान निधि को माना गया था। अब अखिलेश यादव इस मुद्दे को लेकर गंभीर नजर आ रहे हैं और अपने पार्टी के दलित नेताओं को जमीन पर उतारकर सरकार की इन योजनाओं की काट तैयार कर रहे हैं।
समाजवादी पार्टी की ओर से बसपा में रहे जिन प्रमुख दलित और ओबीसी नेताओं को तव्वजों दी जा रही है उसमें सबसे ज्यादा चर्चा स्वामी प्रसाद मौर्य की है। इसके साथ ही इंद्रजीत सरोज, के के गौतम, लाल जी वर्मा और राम अचल राजभर जैसे नेताओं को भी पार्टी आगे रखकर बसपा के वोट बैंक में सेंधमारी करके भाजपा को चुनौती देने का प्रयास कर रही है। समाजवादी पार्टी जहां जातिगत जनगणना के मुद्दे पर पहले से ही आक्रामक है तो काशीराम के नाम के सहारे भी वह दलित वोट बैंक को अपने साथ लाने की कोशिश कर रही है। जिसको लेकर अखिलेश यादव की तरफ से यह बयान भी दिए जाते हैं कि लोहियावादियों के साथ में अंबेडकरवादियों को मिलकर चुनाव लड़ना है।
समाजवादी पार्टी की ओर से दलित नेता अवधेश प्रताप को भी खास तव्वजों दी जा रही है। जहां उन्हें विधानसभा में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के बगल की कुर्सी मिली हुई है तो वहीं पार्टी में भी उनका कद काफी बढ़ा है। राष्ट्रीय सम्मेलन में भी अवधेश प्रसाद को विशेष स्थान दिया गया था। इन सबके पीछे का सबसे बड़ा कारण बसपा सुप्रीमो मायावती का खुद का वोट बैंक है, जो अभी भी प्रदेश की सियासत में एक अपनी महत्वपूर्ण भूमिका रखता है।
समाजवादी पार्टी जहां उसे अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही है तो भाजपा अपनी ओर मोड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। बसपा यह नहीं चाहती कि जो उसका वोट बैंक है वह किसी और खिसके। साथ ही उसकी यह कोशिश है कि इसे बढ़ाया जाए और जिस तरह से एक समय प्रदेश की सियासत में बसपा पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने में सफल हुई थी। उसी रणनीति के तहत एक बार फिर से लोकसभा चुनाव में दांव आजमा कर अपनी ताकत का लोहा मनवाया जाए।
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